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पीएम मोदी के SPG कमांडो के पास हैं ऐसे चश्में, भूल जाइएगा बादशाह फिल्म का चश्मा

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आपने ध्यान दिया होगा कि चाहे दिन हो या रात बॉडीगार्ड हमेशा काला चश्मा ही पहने रहते हैं। फिर वो बॉडीगार्ड किसी राजनेता का हो या फिर अभिनेता का। बॉडीगार्ड काला चश्मा क्यों पहनते है, इसकी वजह आज हम आपको बताएंगे।

 

दरअसल, ये बॉडीगार्ड जब प्रधानमंत्री या किसी अन्य vvip के साथ चल रहे होते हैं या फिर खड़े होते हैं तो उनकी निगाह हर तरफ दौड़ती है। इस बात का किसी व्यक्ति को पता न चले की एसपीजी कमांडो किसको और कहां देख रहे हैं, इसलिए बॉडीगार्ड काले चश्मे पहनते हैं।

एसपीजी कमांडो को चश्मे की मदद से हमलावर के दिमाग को पढ़ना सिखाया जाता है। क्योकि आंखों से वो सब पढ़ा जा सकता है जो हमलावर सोच रहा होता है। इन्हें इस चीज की खास ट्रेनिंग दी जाती है।

सबसे खास वजह तो यह है कि अगर अचानक कोई विस्फोट हो जाए, बम फट जाए या गोलाबारी होने लगे तो स्वाभाविक है धुआ हो जाएगा। जिससे थोड़ी देर के लिए आखें बंद हो जाती हैं। लेकिन इन बॉडीगार्डस को हर हालत में अपनी आखों को खोलकर रखना होता है ताकि कोई घटना न घटे। ऐसे में ये काले चश्मे काफी मददगार साबित होते हैं।

कोई हादसा हो जाए या कुछ आंधी तूफान आ जाये तो ऐसे में आंखों को सेफ रखना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि ऐसे में किसी अप्रिय घटना को भी हमलावर अंजाम दे सकते हैं।

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मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन बोले-बाबर ने बनवाया था मंदिर

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नई दिल्ली। अयोध्या जमीन विवाद मामले की सुनावाई के 28वें दिन मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने अदालत में बाबरनामा का हवाला दिया।

राजीव ने कहा कि वहां मंदिर ही बाबर ने बनाया था। उन्होंने कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि हिन्दू पक्षकार तो गजेटियर का हवाला अपनी सुविधा के मुताबिक दे रहे हैं, लेकिन गजेटियर कई अलग अलग समय पर अलग नजरिये से जारी हुए थे। लिहाजा सीधे तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई।

राजीव धवन ने कहा कि जस्टिस अग्रवाल के इस विचार से भी इत्तेफाक नहीं रखता, जो कहीं रिपोर्ट को मान रहे हैं और कहीं नहीं। इस पर जस्टिस बोबड़े ने पूछा कि कई पुरानी मस्जिदों में संस्कृत में भी कुछ लिखा हुआ मिला है। वो कैसे?

जज के सवाल का जवाब देते हुए राजीव धवन ने कहा कि क्योंकि बनाने वाले मजदूर कारीगर हिंदू होते थे तो वे अपने तरीके से इमारत बनाते थे।

बनाने का काम शुरू करने से पहले वो विश्वकर्मा और अन्य तरह की पूजा भी करते थे और काम पूरा होने के बाद यादगार के तौर पर कुछ लेख भी अंकित करते थे।

 

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