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ऑफ़बीट

पीएम मोदी के घर के नीचे है 2 किमी लंबी सुरंग, वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

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नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद नरेंद्र मोदी दोबारा भारत के प्रधानमंत्री बन चुके हैं। दोबारा सत्ता हासिल करने के बाद पीएम मोदी के सामने इन पांच सालों में कई बड़े वादों को पूरा करने की चुनौती है।

पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी एक बार फिर 7, लोक कल्याण मार्ग यानी 7, रेस कोर्स में रहेंगे। साल 2014 से पीएम मोदी इसी बंगले में रह रहे हैं।

आज हम आपको इस बंगले से जुड़ी एक ऐसी बात बताने जा रहे हैं जो शायद ही किसी को पता होगी। दिल्ली के दिल (संट्रेल दिल्ली) में बसा बसा यह प्रधानमंत्री आवास 12 एकड़ जमीन पर बना है।

 

इस बगंले की दिलचस्प बात यह है कि यहां एक नहीं पांच बंगले है।  यह 1980 में बनकर तैयार हुआ था। इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय और आवास के अलावा सुरक्षा प्रतिष्ठान एसपीजी और गेस्ट हाउस भी शामिल हैं। इस बंगले को रॉबर्ट टॉर द्वारा 1984 में बनाया गया था।

इन बंगलो की सख्या कुंछ इस प्रकार है 1, 3, 5, 7 और 9 है। वर्तमान में 5, लोक कल्याण मार्ग प्रधानमंत्री का निजी आवास है और 7, लोक कल्याण मार्ग उनका कार्यालय।

बंगला नंबर-9 में एसपीजी के लोग रहते है जो प्रधानमंत्री की सुरक्षा को देखते है। बंगला नंबर- 3 प्रधानमंत्री के अतिथियों के लिए बना हुआ है, जबकि बंगला नंबर-1 में प्रधानमंत्री के लिए हेलिपैड के बनाया गया है।

अब आप यही सोच रहे होंगे कि ये बंगले आकार में बहुत बड़े होंगे! जबकि ऐसा नहीं है। इन बंगलों में दो बेडरूम, एक और रूम के अलावा एक डाइनिंग रूम और एक ड्रॉग रूम है। इस ड्रॉइंग रूम में एकसाथ 30 लोग बैठ सकते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीएम आवास के नीचे से करीब 2 किमी लंबी एक सुरंग बनाई गई है। ये सुरंग पीएम आवास को सीधा सफदरजंग हवाईअड्डे से जोड़ती है।

आध्यात्म

जन्माष्टमी स्पेशल : सिर्फ भगवान ही नहीं, क्यों सबसे महान भी हैं श्री कृष्ण, जानिए पूरी कहानी

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यशोदा नंदन, देवकी पुत्र भारतीय समाज में कृष्ण के नाम से सदियों से पूजे जा रहे हैं। तार्किकता के धरातल पर कृष्ण एक ऐसा एकांकी नायक हैं, जिसमें जीवन के सभी पक्ष विद्यमान है। कृष्ण वो किताब हैं जिससे हमें ऐसी कई शिक्षाएं मिलती हैं जो विपरीत परिस्थिति में भी सकारात्मक सोच को कायम रखने की सीख देती हैं।

कृष्ण के जन्म से पहले ही उनकी मृत्यु का षड्‍यंत्र रचा जाना और कारावास जैसे नकारात्मक परिवेश में जन्म होना किसी त्रासदी से कम नहीं था । परन्तु विपरीत वातावरण के बावजूद नंदलाला, वासुदेव के पुत्र ने जीवन की सभी विधाओं को बहुत ही उत्साह से जीवंत किया है। श्री कृष्ण की संर्पूण जीवन कथा कई रूपों में दिखाई पङती है।

नटवरनागर श्री कृष्ण उस संर्पूणता के परिचायक हैं जिसमें मनुष्य, देवता, योगीराज तथा संत आदि सभी के गुण समाहित हैं। समस्त शक्तियों के अधिपति युवा कृष्ण महाभारत में कर्म पर ही विश्वास करते हैं। कृष्ण का मानवीय रूप महाभारत काल में स्पष्ट दिखाई देता है। गोकुल का ग्वाला, बिरज का कान्हा, धर्म की रक्षा के लिए रिश्तों के मायाजाल से दूर, मोह-माया के बंधनों से अलग है।

कंस हो या कौरव-पांडव, दोनों ही निकट के रिश्ते, फिर भी कृष्ण ने इस बात का उदाहरण प्रस्तुत किया कि धर्म की रक्षा के लिए रिश्तों के बजाय कर्तव्य को महत्व देना आवश्यक है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कर्म प्रधान गीता के उपदेशों को यदि हम व्यवहार में अपना लें तो हम सब की चेतना भी कृष्ण सम विकसित हो सकती है।

कृष्ण का जीवन दो छोरों में बंधा है। एक ओर बांसुरी है, जिसमें सृजन का संगीत है, आनंद है, अमृत है और रास है। तो दूसरी ओर शंख है, जिसमें युद्ध की वेदना है, गरल है तथा निरसता है। ये विरोधाभास ये समझाते हैं कि सुख है तो दुःख भी है।

यशोदा नंदन की कथा किसी द्वापर की कथा नहीं है, किसी ईश्वर का आख्यान नही है और ना ही किसी अवतार की लीला। वो तो यमुना के मैदान में बसने वाली भावात्मक रुह की पहचान है। यशोदा का नटखट लाल है तो कहीं द्रोपदी का रक्षक, गोपियों का मनमोहन, तो कहीं सुदामा का मित्र। हर रिश्ते में रंगे कृष्ण का जीवन नवरस में समाया हुआ है।

माखन चोर, नंदकिशोर के जन्म दिवस पर मटकी फोङ प्रतियोगिता का आयोजन, खेल-खेल में समझा जाता है कि किस तरह स्वयं को संतुलित रखते हुए लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है; क्योंकि संतुलित और एकाग्रता का अभ्यास ही सुखमय जीवन का आधार है। सृजन के अधिपति, चक्रधारी मधुसूदन का जन्मदिवस उत्सव के रूप में मनाकर हम सभी में उत्साह का संचार होता है और जीवन के प्रति सृजन का नजरिया जीवन को खुशनुमा बना देता है।

कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, पर राज उन्होंने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होंने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी द्वारका में उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

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