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आतंकी मसूद अजहर बोला- “मुझे गाली दो लेकिन…आदिल को कुछ मत कहना”, चीन पाक के साथ डरने की जरूरत नहीं

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पुलवामा हमले के एक हफ्ते बाद जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर ने एक नया ऑडियो जारी किया है। इसमें ऑडियो में उसने साफ तौर पर मना किया कि पुलवामा हमले में उसका कोई हाथ नहीं। यहां तक की वो आतंकी आदिल अहमद डार को भी नहीं जानता।
इतना ही नहीं उसने पाकिस्तान सरकार और पत्रकारों को डरपोंक भी बताया। बता दें कि हमले के ठीक बाद 14 फरवरी को उसने ही इस हमले की जिम्मेदारी ली थी लेकिन अब वो मुकरता नजर आ रहा है।

गुरुवार को जारी किए गए ऑडियो क्लिप में उसने बोला, “जितनी गाली देनी है दे दो मुझे, लेकिन आदिल अहमद के खिलाफ कुछ ना कहना, कश्मीर में आजादी की लड़ाई अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी है। वहां किसी विदेशी ताकत की जरूरत नहीं है।”

उसने ऑडियो में ये भी कहा कि चीन हमारे साथ है पाकिस्तान को डरने की कोई जरूरत नहीं है। पीएम मोदी कश्मीर में पूरी तरह से फेल हो चुके हैं। बता दें कि अमेरिका, रूस, जापान समेत कई देश जैश-ए-मोहम्मद पर बैन लगाने पर तुले हुए हैं। इसी से इसका सरगना मसूद डरा हुआ है इसलिए बौखला कर ऐसा बयान दे रहा है।

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मुस्लिम देश का वो प्राचीन मंदिर जहां पीएम मोदी ने किए दर्शन

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को इस्लामिक देश बहरीन पहुंचे। इसी के साथ पीएम मोदी इस इस्लामिक देश की यात्रा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं।

अपनी यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने रविवार को इस देश के 200 साल पुराने मंदिर में दर्शन किए। बहरीन की राजधानी मनामा में स्थित यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण का है।

200 साल पहले स्थापित किए गए इस मंदिर का नाम  श्रीनाथजी (श्री कृष्ण) मंदिर  है। हाल ही में मंदिर का नवीनीकरण किया गया है। जिसमें 42 लाख डॉलर (करीब 30 करोड़ रुपये) की लागत आई है।

थाटई हिंदू व्यापारी समुदाय के अध्यक्ष बॉब ठाकेर के अनुसार,  45,000 वर्ग फुट क्षेत्र में तीन मंजिला भवन के साथ मंदिर का नवीनीकरण किया जा रहा है। इस मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए 80 फीसदी अधिक क्षमता होगी। हालांकि पहले मंदिर की क्षमता कम थी।

उन्होंने बताया कि “मंदिर एक नॉलेज सेंटर के अलावा मंदिर से जुड़ा एक संग्रहालय भी है। थाटई हिंदू व्यापारी समुदाय के एक प्रमुख सदस्य भगवान असारपोटा ने कहा कि हम भाग्यशाली हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री मंदिर के 200वें स्थापना वर्ष के उत्सव पर यहां का दौरा कर रहे हैं।”

बताया जाता है इस मंदिर की स्थापना 18वीं शताब्दी के दूसरे दशक में थाटई हिंदू व्यापारी समुदाय के लोगों की ओर से की गई थी। इसी समुदाय के लोग आज भी इस मंदिर की देखभाल करते हैं।

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