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आध्यात्म

जगद्गुरु कृपालु परिषत् द्वारा 10,000 निर्धन ग्रामीणों को बांटी गईं दैनिक उपयोगी वस्तुएं

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भक्ति धाम, मनगढ़ द्वारा बुधवार को मनगढ़ एवं आस-पास के अभावग्रस्त क्षेत्र के निर्धन ग्रामवासियों को दैनिक उपयोगी वस्तुओं का निःशुल्क वितरण किया गया।

जगद्गुरु कृपालु परिषत् की अध्यक्षाओं डॉ विशाखा त्रिपाठी, डॉ श्यामा त्रिपाठी एवं डॉ कृष्णा त्रिपाठी ने निःशुल्क वितरण के अन्तर्गत लगभग 10,000 गरीबों को एक-एक स्टील की परात, तौलिया एवं टॉर्च बांटे।

आपको बता दें कि इससे पहले 17 मार्च 2019 को भी लगभग 1100 निर्धन ग्रामवासियों को एक-एक बड़े टिन का बक्सा, दस किलो दाल प्रदान की गई, साथ ही चीनी एवं घी जैसे दैनिक उपयोगी वस्तुएं बांटी भी दिया गया।

आध्यात्म

कुम्भ ख़त्म होने के बाद कहां चले जाते है नागा साधु, जानकर हैरान रह जाएंगे आप

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प्रयागराज में आयोजित हो रहे कुभं मेला में देशभर में नागा साधु आए है। इन साधुओं के मुंह पर महादेव का नाम, शरीर पर भस्म और हाथों में तीर-तलवार-त्रिशूल साथ रखते है।

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बहुत कम लोग जानते हैं कि कुंभ में आए साधु मेला ख़त्म होने के बाद ये आम साधु संन्यासी की तरह पूजा-पाठ व जाप करते हैं या फिर हिमालय की कंदराओं और घने जंगलों में तप के लिए निकल जाते हैं।

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नागा संन्यासी की माने तो दिगंबर शब्द दिग् व अम्बर के योग से बना है। दिग् यानी धरती और अम्बर यानी आकाश। आशय कि धरती जिसका बिछौना हो और अम्बर जिसका ओढ़ना।

नागा साधुओं का कहना है कि सालभर दिगम्बर अवस्था में रहना समाज में संभव नहीं है। निरंजनी अखाड़े के अध्यक्ष महंत रवींद्रपुरी जो खुद भी पेशवाई के दौरान नागा रूप धारण करते हैं, कहते हैं कि समाज में आमतौर पर दिगम्बर स्वरूप स्वीकार्य नहीं है।

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नागा संन्यासी बनने के लिए वयस्क होना आवश्यक है। वयस्क होने पर उसे गंगा की शपथ दिलाई जाती है कि वह परिवार में नहीं जाएगा और न ही विवाह करेगा। आपको बता दें, समाज से अलग रहेगा, ईश्वर भक्ति करेगा। खुद का भी पिंडदान कराया जाता है।

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