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खेल-कूद

भारत अफगानिस्तान टेस्ट मैच : टेस्ट मैच की पहली पारी के पहले सत्र में शतक लगाने वाले पहले भारतीय बने शिखर धवन

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भारतीय सलामी बल्लेबाज शिखर धवन भारत के ऐसे बल्लेबाज बन गए हैं, जिन्होंने किसी भी टेस्ट मैच में पहली पारी के पहले सत्र में शतक लगाया है।बेंगलुरू एम.ए चिन्नास्वामी स्टेडियम अफगानिस्तान भारत टेस्ट मैच हो रहा है। अफगानिस्तान के लिए ऐतिहासिक मैच है। अफगानिस्तान टेस्ट मैच खेलने वाला 12वां देश बन गया है। हाल ही में अफगानिस्तान और आयरलैंड को आईसीसी ने टेस्ट टीम का दर्जा दिया था।

उल्लेखनीय है कि भारतीय टीम ने भोजनकाल तक अपनी पहली पारी में शिखर धवन की नाबाद 104 रनों की शतकीय पारी और मुरली विजय के 41 रनों के दम पर अफगानिस्तान के खिलाफ बिना कोई विकेट गंवाए 158 रनों का स्कोर खड़ा कर लिया है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी टेस्ट मैच की पहली पारी के पहले सत्र में शतक लगाने वाले शिखर धवन छठे बल्लेबाज हैं। इस सूची में उनसे पहले आस्ट्रेलिया के विक्टर ट्रंपर, चार्ली मैकार्टनी, डॉन ब्रैडमैन और डेविड वॉर्नर के अलावा पाकिस्तान के मजीद खान का नाम शामिल है।

आस्ट्रेलिया के ट्रंपर ने साल 1902 में मैनचेस्टर में इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए टेस्ट मैच में पहले सत्र में 103 रन बनाते हुए शतक लगाया था। इसके अलावा 1926 में आस्ट्रेलिया के ही बल्लेबाज मैकार्टनी ने इंग्लैंड के ही खिलाफ यह कारनामा किया था। उन्होंने 112 रन बनाए थे।

आस्ट्रेलिया के ही एक अन्य बल्लेबाज ब्रैडमैन ने इंग्लैंड के ही खिलाफ 1930 में लीड्स मैदान पर खेले गए टेस्ट मैच में पहले सत्र में 105 रनों की शतकीय पारी खेलकर यह उपलब्धि हासिल की थी। इसके बाद पाकिस्तान के मजीद ने 1976-77 में कराची के स्टेडियम में न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट मैच के पहले सत्र में 108 रन बनाकर शतकीय पारी खेली थी।

आस्ट्रेलिया के डेविन वॉर्नर ने इस क्रम में पांचवां स्थान हासिल किया है। उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ 2016-17 में सिडनी में खेले गए टेस्ट मैच के पहले सत्र में 100 रन बनाकर यह उपलब्धि अपने नाम की थी। (इनपुट आईएएनएस)

खेल-कूद

हॉकी में ओलंपिक पदक जीतकर बीमार पिता इलाज कराना चाहती हैं सोनीपत की निशा

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नई दिल्ली। टोक्यो ओलंपिक के लिए महिला हॅाकी टीम में चयनित होने वाली सोनीपत की निशा अपने दर्जी पिता का इलाज कराकर उन्हें नया घर देना चाहती है। बीमार पिता की हालत के चलते निशा को हॅाकी छोड़ना पड़ा था।

पिता को लकवा मारते ही निशा के घर की हालत खराब होना शुरू हो गई। तब निशा ने खेलना शुरू ही किया था। लेकिन केवल एक कमाऊ सदस्य होने के कारण निशा व उनकी दो बहनों को काम करना पड़ा।

निशा ने हॅाकी छोड़ दी पर उनकी कोच प्रीतम रानी सिवाच ने उनका साथ न छोड़ते हुए निशा को प्रेरित किया। यह कोच की प्रेरणा और निशा की मेहनत ही है कि वह टोक्यो ओलंपिक मे चयनित हो सकी। निशा बेबाकी से कहती हैं कि वह ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन कर अपने पिता का बेहतर इलाज और घर देना चाहती है।

पिता ने कहां, अब देश का नाम रोशन करो

निशा के पिता दर्जी हैं। उनके लकवाग्रस्त होने के बाद उनका काम-धंधा बंद हो गया। निशा कहती है, उनके मामा ने उनकी बहुत मद्द की और उनके साथ उनकी बहनों ने भी बहुत काम किया।

अब उनकी शादी हो चुकी है और निशा की भी रेलवे में नौकरी लग चुकी हैं। लेकिन माता-पिता अब भी सोनीपत में छोटे से मकान में रहते हैं। इसलिए निशा अपने पिता का इलाज कराकर उन्हें एक नया घर देना चाहती हैं।

निशा बताती है कि सबसे पहले अपने ओलंपिक में चयनित होने की खबर उन्होंने अपनी कोच प्रीतम को दी। उसके बाद अपने पिता सोहराब को। पिता के मुंह से यही निकला कि जिसके लिए तुमनें मेंहनत ही उसका फल तुम्हें मिल गया। अब देश का नाम रोशन करो।

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