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Corona Protection : आदर्श कारागार में हो रहा मास्क का रिकॉर्ड उत्पादन

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लखनऊ। राजधानी के आदर्श कारागार ने कोरोना से बचाव के लिए मास्क बनाने में प्रदेश के सभी जेलों को पीछे छोड़ दिया है। इस जेल में अभी तक 35 हज़ार से अधिक मास्क बनाये जा चुके है। यह जेल यहाँ निर्मित मास्क को सिर्फ जेलों में ही नही प्रदेश के स्वास्थ, पुलिस समेत अन्य विभागों को भी उपलब्ध करा रही है। जेल प्रशासन ने मास्क की बिक्री कीमत मात्र 5 रुपए रखी है।

आदर्श कारागार एशिया की एकमात्र जेल है जहाँ रहकर कैदी जेल के बाहर रहकर व्यवसाय करने के साथ परिवार का भी संचालन करते है। दुनिया मे कोरोना वायरस से प्रदेश के जेलों में बंद कैदियों को बचाने के लिए महानिदेशक/ महानिरीक्षक कारागार आनंद कुमार ने मास्क बने जाने का निर्णय लिया। इसके तरह प्रदेश की कई जेलों में मास्क का निर्माण कराया जा रहा है।

मिली जानकारी के मुताबिक राजधानी की आदर्श कारागार ने मास्क निर्माण में रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन किया है। इस कारागार में अब तक 35 हज़ार से अधिक मास्क बनाये जा चुके है। मास्क का उत्पादन लगातार चल रहा है। आदर्श कारागार के सुपरिटेंडेंट आरएन पांडेय से जब इस संबंध में बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि कैदियों के द्वारा निर्मित मास्क की कीमत 5 रुपये रखी गयी है।

पांडेय का कहना है कि मास्क सस्ता होने की वजह से पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय सीतापुर ने 6000 मास्क की डिमांड की थी उन्हें 2000 भेजे जा चुके है। इसी प्रकार पुलिस हेल्पलाइन 112 ने भी उनसे 2000 की डिमांड की थी उन्हें उपलब्ध करा दिए गए है। इस क्रम में निदेशक स्वास्थ, आरआई पुलिस लाइन समेत अन्य कई विभागों को अब तक 35 हज़ार 192 मास्क उपलब्ध कराए जा चुके है।

सुपरिटेंडेंट आदर्श कारागार पांडेय का कहना है कि मास्क की कीमत कम होने की वजह से डिमांड बहुत है।उत्पादन के हिसाब से विभागों को मास्क उपलब्ध कराए जा रहे है। इसका उत्पादन फिलहाल जारी है। मास्क निर्माण कार्य मे बड़ी संख्या में कैदी लगाये गए है। वह दिनरात मेहनत कर डिमांड को पूरा करने में जुटे हुए है।

प्रदेश की जेलों में मास्क निर्माण की जानकारी लेने के लिए जब महानिदेशक/ महानिरीक्षक आनंद कुमार से बात करने को कोशिश की गई तो उनला फ़ोन नही उठा। उधर अपर महानिरीक्षक कारागार प्रशासन वीके जैन ने बताया कि प्रदेश की जेलों में अब तक 1 लाख 12 हज़ार से अधिक मास्क का निर्माण किया जा चुका है। मास्क निर्माण का कार्य लगातार जारी है।

रिपोर्ट – राकेश यादव

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श्रमजीवी पत्रकार डॉ. के. विक्रम राव हैं हर एक मीडिया पर्सन के लिए मिसाल

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समाज की सच्ची तस्वीर दिखाना हर एक ईमानदार पत्रकार की ज़िम्मेदारी होती है, ऐसे ही एक श्रमजीवी पत्रकार हैं डॉ. के. विक्रम राव।गद्यकार, सम्पादक, मीडिया शिक्षक और टीवी, रेडियो समीक्षक डॉ. के. विक्रम राव श्रमजीवी पत्रकारों के मासिक दि वर्किंग जर्नलिस्ट के प्रधान सम्पादक हैं।

वे वॉयस ऑफ अमेरिका (हिन्दी समाचार प्रभाग, वाशिंगटन) के दक्षिण एशियाई ब्यूरो में 15 वर्षों तक संवाददाता रहे। वे 1962 से 1998 तक दैनिक टाइम्स ऑफ इण्डिया (मुंबई) में कार्यरत थे।

नौ प्रदेशों में इसके ब्यूरो प्रमुख रहे। सम्प्रति 85 तेलुगु, हिंदी, उर्दू तथा अंग्रेजी पत्रिकाओं में स्तंभकार हैं। वे मुम्बई, हैदराबाद, कोची, दिल्ली, अहमदाबाद, कोलकत्ता आदि के पत्रकारिता संस्थानों में रिपोर्टिंग पर व्याख्याता भी हैं।

वे डॉ. धर्मवीर भारती के “धर्मयुग” और रघुवीर सहाय के “दिनमान” में लिखते रहे। वे दैनिक इकनामिक टाइम्स, और पाक्षिक फिल्मफेयर में भी काम कर चुके हैं। विक्रम राव की समाचार रिपोर्ट की चर्चा विभिन्न विधान मण्डलों तथा संसद के दोनों सदनों में होती रही हैं।

मुरादाबाद, अहमदाबाद और हैदराबाद के साम्प्रदायिक दंगों पर उनकी रिपोर्ट अपनी वास्तविकता और सत्यता के लिए प्रशंसित हुई।बुन्देलखण्ड और उत्तर गुजरात में अकाल स्थिति पर भेजी उनकी रिपोर्टों से सरकारी और स्वयंसेवी संगठनों ने तात्कालिक मदद भेजी जिससे कई प्राण बचाए जा सके।

विक्रम राव की मातृभाषा तेलुगु है। वे मराठी, गुजराती तथा उर्दू भी जानते हैं। उन्होंने मीडिया पर नौ और डॉ. लोहिया पर दो पुस्तकें लिखी हैं। वे भारतीय प्रेस काउंसिल (PCI) के छह वर्षों (1991) तक लगातार सदस्य रहे।

श्रमजीवी पत्रकारों के लिए भारत सरकार द्वारा 2008 में गठित जस्टिस जी.आर. मजीठिया और मणिसाणा वेतन बोर्ड (1996) के वे सदस्य थे। प्रेस सूचना ब्यूरो की केन्द्रीय प्रेस मान्यता समिति के पाँच वर्षों तक वो सदस्य रहे।

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