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पुरातत्व विभाग को मिला घटोत्कच का विशालकाय कंकाल? सच जानें यहां….

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नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक तस्वीर खूब वायरल हो रही है। तस्वीर को लेकर दावा किया जा रहा है कि महाभारतकाल के घटोत्कच का कंकाल पुरात्तव विशेषज्ञ को कुरूक्षेत्र में मिला है।

फेसबुक पर पोस्ट में लिखा है, “कुरुक्षेत्र के पास खुदाई करते समय विदेशी पुरातत्व विशेषज्ञों को एक 80 फुट की लंबाई के मानव कंकाल के अवषेश मिले जो महाभारत के भीम के पुत्र घटोत्कच के वर्णन के समान हैं।” फेसबुक पर ये तस्वीर अबतक 6600 से ज्यादा बार शेयर की जा चुकी है।

कुरूक्षेत्र के पास खुदाइ करते समय विदेशी पुरातत्व विशेषज्ञों को एक 80 फुट की लम्बाई के मानव कंकाल के अवषेश मिले जो…

Kurukshetra-The Historical Place ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಮಂಗಳವಾರ, ಜೂನ್ 26, 2018

फेसबुक पर वायरल हो रही तस्वीर जब हमारे पास पहुंची तो हमने इसकी सच्चाई जाननी चाही। हमने जब इस तस्वीर की पड़ताल की तो पाया कि वायरल हो रही फोटो एक इटैलियन आर्टिस्ट की बनाई कलाकृति है।

दरअसल, यह विशालकाय कंकाल न तो घटोत्कच का है और न ही किसी और इंसान का। यह इटैलियन आर्टिस्ट जिनो डी डोमिनिसिस का बनाया स्कल्पचर है जिसे पहली बार वर्ष 1990 में फ्रांस के ग्रेनोबल शहर में स्थित सेंटर नेशनल डेआर्ट कॉन्टेम्पोरियन में अनावृत किया गया था।

वर्ष 2007 में इसे मिलान के प्लाजो रियल में प्रदर्शित किया गया था। वायरल तस्वीर वहीं की है। ट्रेवल वेबसाइट atlas obscura  पर छपे एक आर्टिकल के अनुसार इस कंकाल का नाम “Calamita Cosmica” या “Cosmic Magnet” है। यह 28 मीटर लंबा और करीब आठ टन वजनी है। डोमिनिसिस ने यह स्कल्पचर अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले पूरा किया था।

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मंगल पांडे को फांसी देने से जल्लाद ने कर दिया था इनकार, फिर अंग्रेजों ने किया ये काम

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नई दिल्ली। भारत को आजादी की बात करने पर सबसे पहले मंगल पांडे का नाम दिमाग में आता है। मंगल पांडे भारत को आजादी दिलाने के लिए अपनी जान देने वाले पहले भारतीय थे।

उनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन बुरी तरह हिल गया था। आज उनकी 192वीं जयंती है। उनका जन्म आज ही के रोज  जन्‍म 1827 में 19 जुलाई को हुआ था।

अपनी हिम्मत और हौसले के दम पर समूची अंग्रेजी हुकूमत के सामने मंगल पांडे की शहादत ने भारत में पहली क्रांति के बीज बोए थे।

उनका जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम  दिवाकर पांडे और मां का नाम श्रीमती अभय रानी था।

वे कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” की पैदल सेना के 1446 नंबर के सिपाही थे। भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात् 1857 के संग्राम की शुरुआत उन्हीं के विद्रोह से हुई थी।

18 अप्रैल, 1857 का दिन मंगल पांडे की फांसी के लिए निश्चित किया गया था। आपको बता दें, बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के खून से अपने हाथ रंगने से इनकार कर दिया।

तब कलकत्ता (कोलकाता) से चार जल्लाद बुलाए गए। 8 अप्रैल, 1857 के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया।

 

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