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सेल्समैन की नौकरी करने वाला शख्स बना सुपरस्टार, एक फिल्म के लेता है करोड़ों रुपए!

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मुंबई। फिल्म इंडस्ट्री में कड़े संघर्षों के बाद स्टार बनने की कई कहानी आपने सुनी होगी लेकिन आज हम जिस एक्टर के स्ट्रगल के बारे में बताने जा रहे हैं वो वाकई काबिल-ए-तारीफ है।

हम बात कर रहे हैं साउथ के सुपरस्टार विजय सेतुपति की। विजय के संघर्ष के दिनों की कहानी किभी भी नए सितारे के लिए प्रेरणा का काम कर सकती है। विजय सेतुपति की गिनती तमिल इंडस्ट्री की ऐसा सितारों में होती है जो चुनिंदा रोल को परफेक्शन से करते हैं।

तमिल सिनेमा को बुलंदियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले विजय को किसी समय गरीबी की वजह से कई छोटे-मोटे काम करने पड़े। पॉकेट मनी के लिए उन्होंने सेल्समैन, कैशियर और फोन बूथ ऑपरेटर तक की नौकरी करनी पड़ी।

परिवार की स्थिति और अपने तीन भाई-बहनों की देखभाल करने के लिए विजय बी.कॉम करने के बाद दुबई नौकरी करने चले गए। दो साल अकाउंटेंट की नौकरी करने के बाद जब विजय को लगा कि उन्हें कुछ और करना चाहिए तो सब कुछ छोड़कर वह भारत वापस आ गए।

एक्टिंग से विजय को इतना लगाव था कि भारत आकर उन्होंने एक थियेटर में अकाउंटेंट की नौकरी तक की। यहां कई तरह के काम किए लेकिन फिर एक दिन एक्टिंग में करियर शुरू करने का फैसला किया क्योंकि बालू महेंद्र ने उनसे एक बार कहा था कि तुम्हारा चेहरा फोटोजनिक है। विजय सेतुपति ने एक्टिंग की क्लास ली और फिर छोटे-मोटे रोल फिल्मों में करते रहे।

फिल्मों में विजय बैकग्राउंड एक्टर के तौर पर करियर की शुरुआत की। धीरे-धीरे अपनी एक्टिंग के दम पर उन्हें इंडस्ट्री में पहचाना जाने लगा। साल 2012 उनके लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।

इस साल रिलीज हुई उनकी फिल्म ‘पिज्जा’ और ‘नादुवुला कुंज पक्काता कानोम’ ने उनकी जिंदगी बदल दी। यह दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहीं। ‘पिज्जा’ में वे डिलीवरी ब्वॉय बने थे जबकि ‘नादुवुला कुंज पक्काता कानोम’ में ऐसे युवा का किरदार निभाया था जिसकी याद्दाश्त उसकी शादी से दो दिन पहले चली जाती है। दोनों ही किरदारों से विजय ने दर्शकों का दिल जीता।

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जानिए करण जौहर ने क्यों कहा, ‘मैं माफी नहीं मांगूंगा’

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मुंबई। फिल्म इंडस्ट्री के लोगों या अमीरों को प्राथमिकता देने के लिए फिल्मकार करण जौहर को अकसर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन करण का कहना है कि वह अपनी बनाई हुई फिल्मों के लिए माफी नहीं मांगेंगे, हालांकि बदलते वक्त के साथ वह सिनेमा बनाने की अपनी पद्धति को बदलने के लिए तैयार हैं।

मुंबई में लेखिका शुनाली खुल्लर श्रॉफ की किताब ‘लव इन द टाइम ऑफ एफफ्लूएन्जा’ की लॉन्चिंग पर मीडिया से बात करने के दौरान करण ने कहा, “मैंने उस किस्म की फिल्में इसलिए बनाई है क्योंकि मैं एक निश्चित माहौल में बड़ा हुआ हूं और वहां एक ऐसी तमन्ना भी थी जो मेरे सोचने के तरीके के साथ जुड़ी हुई थी। मैं हमेशा सोचता था कि सिनेमा असल जीवन से कहीं ज्यादा है और इसलिए मैंने ऐसे किरदार बनाए जिनकी लोग तमन्ना करते हैं।”

करण ने आगे कहा, “लेकिन कहीं न कहीं आगे चलकर सिनेमा का रचनाक्रम बदल गया और मुझे उसे स्वीकारना होगा और निश्चित करना होगा कि मेरे किरदार और भी ज्यादा जमीन से जुड़े हुए और वास्तविक हो ताकि वह अब और ज्यादा चमक-धमक वाले नहीं लगे।”

करण ने यह भी कहा, “मुझ पर एफफ्लूएंजा का आरोप है, लेकिन यह कहते हुए मैं उन फिल्मों के लिए माफी नहीं मांगूंगा जिन्हें मैंने बनाया है हालांकि मुझे लगता है कि भविष्य में मुझे इसमें बदलाव लाना होगा।”

एफफ्लूएंजा का तात्पर्य अमीरों की समस्या से है। अधिकतर ऐसा माना जाता है कि अमीरों के पास वास्तव में कोई परेशानियां नहीं होती है। जिंदगी को जीने में उन्हें अकेलापन, जीवन से उब जाना या असंतुष्ट हो जाने जैसी समस्याओं का ही सामना करना पड़ता है और इसमें खुद को खुश रखने के लिए वे पैसों के पीछे भागते हैं।

 

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