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वैज्ञानिकों ने खोल दिया नर्क का दरवाजा, उठ रही हैं बेकाबू आग की लपटें!

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नई दिल्ली। दुनिया में कई ऐसी घटनाएं घटती हैं, जिसके आगे विज्ञान भी नत्मस्तक हो जाता है। ऐसी ही एक घटना के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे जिसे जानकर आप दंग रह जाएंगे।

तुर्कमेनिस्तान के काराकुम रेगिस्तान में एक लंबे चौड़े गढ्ढे से भयानक आग की लपटें निकल रही हैं। यह रहस्यमई आग लगभग 47 सालों से इस गढ्ढे से निकल रही है। स्थानीय लोग इसे नर्क का द्वार कहते हैं।

दरअसल, साल 1971 में वैज्ञानिकों का एक दल प्राकृतिक गैस की खोज में तुर्कमेनिस्तान के काराकुम रेगिस्तान पहुंचा और वहां पर एक गड्ढा खोदा गया। गड्ढे के आसपास बड़ी-बड़ी मशीनें लगाई गईं और जमीन के अंदर खुदाई शुरू की गई।

एक दिन अचानक यह हिस्सा भरभरा कर गिर गया जिसकी वजह से यहां 130 फीट चौड़ा और 60 फीट गहरा बड़ा गढ्ढा हो गया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने सोचा कि इस गैस को जला दिया जाए तो कुछ दिनों बाद अपने आप ये गैस खत्म हो जाएगी और आग बुझ जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

ये गैस आजतक बिना बुझे जल रही है। स्थानीय सरकार ने इस गड्ढे को भरने की कई बार कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अब ये जगह लोगों के बीच काफी फेमस हो चुकी हैं। दूर-दूर से लोग इस नर्क के द्वार को देखने आते हैं।

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इस मुस्लिम देश के पहाड़ पर दिखे ‘भगवान राम’, देखें तस्वीर

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नई दिल्ली। इराक गए भारतीय प्रतिनिधिमंडल को दो हजार ईसा पूर्व के भित्तिचित्र मिले हैं। इस भित्तिचित्र को लेकर अयोध्या शोध संस्थान का दावा है कि ये भगवान राम की छवि है।

भगवान राम का ये भित्तिचित्र इराक के होरेन शेखान क्षेत्र में संकरे मार्ग से गुजरने वाले रास्ते पर दरबंद-ई-बेलुला चट्टान में मिला है। इस चित्र में एक राजा को दिखाया गया है, जिसने धनुष पर तीर ताना हुआ है।

उनकी कमर के पट्टे में एक खंजर या छोटी तलवार लगी है। इसी चट्टान में एक और छवि भी है, जिसमें एक शख्स हाथ मुड़े हुए दिख रहा है। अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक योगेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि ये भगवान हनुमान की छवि है।

वहीं इराक के विद्वानों का कहना है कि ये भित्तिचित्र पहाड़ी जनजाति के प्रमुख टार्डुनी का है। भारतीय राजदूत प्रदीप सिंह राजपुरोहित की अगुआई में ये प्रतिनिधिमंडल इराक गया था। जिसके लिए संस्कृति विभाग के अंतर्गत आने वाले अयोध्या शोध संस्थान ने अनुरोध किया था।

प्रदीप सिंह का दावा है कि इन चित्रों से पता चलता है कि भगवान राम सिर्फ कहानियों में नहीं थे क्योंकि ये निशान उनके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। भारतीय और मेसोपोटामिया संस्कृतियों के बीच संबंध का विस्तृत अध्ययन करने के लिए भी इस प्रतिनिधिमंडल ने चित्रमय प्रमाण भी एकत्रित किए हैं।

वहीं इराक के इतिहासकार अयोध्या शोध संस्थान की  बातों से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। उनका कहना है कि वे इस चित्र को भगवान राम से जुड़ा नहीं मानते हैं।

उनका कहना है कि ये साबित करने के लिए गायब लिंक को खोजना जरूरी है। उनका कहना है कि उन्होंने शोध के लिए इराक की सरकार से अनुमति मांगी है। अनुमति मिलने के बाद सभी कड़ियों को जोड़ने का काम किया जाएगा।

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