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ये हैं भारत के वो तीन रहस्यमई किले जहां जाने में सरकार भी कांपती है

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नई दिल्ली। भारत के बहुत से मशहूर किलें हैं जिनके बारे में लोगों को अच्छे से पता है, लेकिन आज हम जिन किलों के बारे में बताने जा रहे हैं उनके बारे में शायद ही पहले कभी आपने सुना होगा।

 

इस लिस्ट में सबसे पहला नाम रायसेन के किले का आता है। रायसेन का किला मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इतिहासकारों का कहना है की इस किले में लोहे से सोना बनाने वाला पारस पत्थर मौजूद है।

प्राचीन समय मे यह पत्थर राजा रायसेन के पास था किन्तु जब विदेशी आक्रमणकारियों ने इस पत्थर को हासिल करने के लिए जब भारत पर हमला किया तो रायसेन ने उस पत्थर को एक तालाब मे फेक दिया।

 

कहा जाता है कि तभी से इस पत्थर की रक्षा एक जिन्न करता है। स्थानीय लोगो का कहना है कि जो भी उस पत्थर को पाने की चाह में यहां आता है वो मानसिक  रोगी हो जाता है।

 

बांधवगढ़ के किले में भी कुछ ऐसे ही राज़ दफ़्न हैं। बांधवगढ़ के किले का निर्माण आज से दो हजार साल पहले राजा रिवादेव ने करवाया था। इस किले का वर्णन शिवपुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में भी किया गया है। यह किला चारों तरफ से घनघोर जंगलों से घिरा हुआ है। इन जंगलों में कई खतरनाक जीव भी रहते हैं।

परबल दुर्ग भी कम रहस्यमई नहीं है। यह किला 23 फ़ीट की एक खड़ी पहाड़ी पर बनाया गया है जो की अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं। इस किले के ऊपर से आप चन्देरी, करनाल आदि शहरों की झलक देख सकते हैं।

परबल किले पर जाने के लिए भयानक जंगलों का सामना करना पड़ता है। साथ ही इस दुर्ग के ऊपर तक पहुंचने के लिए खतरनाक रास्तों से भी गुजरना पड़ता है। बहुत कम लोग ही इस दुर्ग तक पहुंच पाए हैं।

रिपोर्ट-मानसी शुक्ला

 

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मंगल पांडे को फांसी देने से जल्लाद ने कर दिया था इनकार, फिर अंग्रेजों ने किया ये काम

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नई दिल्ली। भारत को आजादी की बात करने पर सबसे पहले मंगल पांडे का नाम दिमाग में आता है। मंगल पांडे भारत को आजादी दिलाने के लिए अपनी जान देने वाले पहले भारतीय थे।

उनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन बुरी तरह हिल गया था। आज उनकी 192वीं जयंती है। उनका जन्म आज ही के रोज  जन्‍म 1827 में 19 जुलाई को हुआ था।

अपनी हिम्मत और हौसले के दम पर समूची अंग्रेजी हुकूमत के सामने मंगल पांडे की शहादत ने भारत में पहली क्रांति के बीज बोए थे।

उनका जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम  दिवाकर पांडे और मां का नाम श्रीमती अभय रानी था।

वे कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” की पैदल सेना के 1446 नंबर के सिपाही थे। भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात् 1857 के संग्राम की शुरुआत उन्हीं के विद्रोह से हुई थी।

18 अप्रैल, 1857 का दिन मंगल पांडे की फांसी के लिए निश्चित किया गया था। आपको बता दें, बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के खून से अपने हाथ रंगने से इनकार कर दिया।

तब कलकत्ता (कोलकाता) से चार जल्लाद बुलाए गए। 8 अप्रैल, 1857 के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया।

 

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