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Live: शहीद मेजर बिष्ट को नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई

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नई दिल्ली। जम्मू कश्मीर के एलओसी पर बारूदी सुरंग विस्फोट में शहीद हुए मेजर चित्रेश सिंह का शव अंतिम संस्कार के लिए रविवार को देहरादून ले जाया गया। मेजर चित्रेश सिंह 16 फरवरी को राजौरी में नियंत्रण रेखा के पास IED बम डिफ्यूज करते समय विस्फोट में शहीद हो गए थे।

मेजर बिष्‍ट के शहीद होने की खबर के बाद से ही पूरे परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। जब उनका पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचा तो वहां का मंजर देखकर हर कोई भावुक था। खुली जीप पर मेजर का शव जब सड़क से निकला तो हर कोई नम आंखों से उन्हें विदाई दे रहा था।

अंतिम संस्कार में शामिल लोगों ने इस दौरान लोग वंदे मातरम और चित्रेश बिष्ट अमर रहें… के नारे लगाए। हर कोई शहीद को कंधा देने के लिए तत्पर नजर आ रहा था। ति‍रंगे में लिपटे शहीद के शव के साथ हजारों लोगों की भीड़ शामिल थी।

अधिकारियों ने अनुसार, 16 फरवरी को दोपहर करीब तीन बजे नौशेरा सेक्टर में ट्रैक पर बारूदी सुरंग का पता चला था. मेजर बिष्‍ट के नेतृत्‍व में बम निरोधक दस्ते ने एक बारूदी सुरंग को तो सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया, लेकिन जब वे दूसरी सुरंग को निष्क्रिय कर रहे थे तो उसमें विस्फोट हो गया जिसमें मेजर विष्ट शहीद हो गए और एक जवान घायल हो गया।

मेजर के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए सेना के वरिष्ठ अफसरों के अलावा उत्तराखंड के सीएम त्र‍िवेंद्र सिंह रावत भी मौजूद थे। सीएम ने मेजर चित्रेश सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

मेजर बिष्‍ट की 7 मार्च को शादी होनी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनका वेडिंग कार्ड भी बंट चुके थे। मेजर बिष्‍ट के पिता एसएस बिष्‍ट उन्‍हें बार-बार शादी की तैयारियों के लिए छुट्टी लेकर आने को कह रहे थे, लेकिन वे अपने फर्ज को तवज्‍जो देते हुए सीमा पर ही डटे रहे।

31 साल के मेजर बिष्ट उत्तराखंड में देहरादून के रहने वाले थे। वे भारतीय सैन्‍य एकेडमी देहरादून से 2010 में पासआउट हुए थे। वर्तमान समय में वह सेना की इंजीनियरिंग कोर में तैनात थे। उनके पिता एसएस बिष्‍ट उत्‍तराखंड पुलिस में थे।

 

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मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन बोले-बाबर ने बनवाया था मंदिर

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नई दिल्ली। अयोध्या जमीन विवाद मामले की सुनावाई के 28वें दिन मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने अदालत में बाबरनामा का हवाला दिया।

राजीव ने कहा कि वहां मंदिर ही बाबर ने बनाया था। उन्होंने कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि हिन्दू पक्षकार तो गजेटियर का हवाला अपनी सुविधा के मुताबिक दे रहे हैं, लेकिन गजेटियर कई अलग अलग समय पर अलग नजरिये से जारी हुए थे। लिहाजा सीधे तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई।

राजीव धवन ने कहा कि जस्टिस अग्रवाल के इस विचार से भी इत्तेफाक नहीं रखता, जो कहीं रिपोर्ट को मान रहे हैं और कहीं नहीं। इस पर जस्टिस बोबड़े ने पूछा कि कई पुरानी मस्जिदों में संस्कृत में भी कुछ लिखा हुआ मिला है। वो कैसे?

जज के सवाल का जवाब देते हुए राजीव धवन ने कहा कि क्योंकि बनाने वाले मजदूर कारीगर हिंदू होते थे तो वे अपने तरीके से इमारत बनाते थे।

बनाने का काम शुरू करने से पहले वो विश्वकर्मा और अन्य तरह की पूजा भी करते थे और काम पूरा होने के बाद यादगार के तौर पर कुछ लेख भी अंकित करते थे।

 

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