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भारत में क्यों इस्तेमाल किए जाते तीन ब्लेड वाले पंखे, जानकर सिर पकड़ लेंगे आप!

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नई दिल्ली। गर्मियों के मौसम में सबसे ज्यादा राहत देने वाली चीज पंखा होता है। भारत में लगभग हर घर में आपको पंखे मिल जाएंगे, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत के पंखों में क्यों तीन ही ब्लेड होते हैं जबकि विदेशों के पंखों में चार ब्लेड लगे होते हैं? अगर आपका जवाब न है तो हम बताते हैं।

अमेरिका, रूस या ठंडे देशों में लोग अपने घरों में 4 ब्लेड वाले पंखे इस्तेमाल करते हैं। चूंकि वहां लोगों के पास एयर कंडीशनर (एसी) होता है, इसलिए वो पंखों का इस्तेमाल एसी के सप्लीमेंट के रूप में करते हैं, जिसका मकसद एसी की हवा को पूरे कमरे में फैलाना होता है।

भारत में पंखों का इस्तेमाल ठंडी हवा के लिए किया जाता है। गर्मियों के मौसम में यह काफी आरामदायक होता है। आपको बता दें कि तीन ब्लेड वाले पंखे चार ब्लेड वाले पंखों की तुलना में हल्के होते हैं और काफी तेज भी चलते हैं। इसलिए भारत में अधिकतर 3 ब्लेड वाले पंखे ही इस्तेमाल होते हैं।

चार ब्लेड्स वाले पंखों की तुलना में तीन ब्लेड वाले पंखे से बिजली की बचत होती है। छोटे कमरों के लिए तीन ब्लेड वाले पंखे काफी फायदेमंद होते हैं। यह कमरे के चारों कोनों तक हवा पहुंचाते हैं। साथ ही चार ब्लेड्स वाले पंखों की अपेक्षा तीन ब्लेड वाले पंखे कम दाम में भी मिल जाते हैं।

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मंगल पांडे को फांसी देने से जल्लाद ने कर दिया था इनकार, फिर अंग्रेजों ने किया ये काम

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नई दिल्ली। भारत को आजादी की बात करने पर सबसे पहले मंगल पांडे का नाम दिमाग में आता है। मंगल पांडे भारत को आजादी दिलाने के लिए अपनी जान देने वाले पहले भारतीय थे।

उनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन बुरी तरह हिल गया था। आज उनकी 192वीं जयंती है। उनका जन्म आज ही के रोज  जन्‍म 1827 में 19 जुलाई को हुआ था।

अपनी हिम्मत और हौसले के दम पर समूची अंग्रेजी हुकूमत के सामने मंगल पांडे की शहादत ने भारत में पहली क्रांति के बीज बोए थे।

उनका जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम  दिवाकर पांडे और मां का नाम श्रीमती अभय रानी था।

वे कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” की पैदल सेना के 1446 नंबर के सिपाही थे। भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात् 1857 के संग्राम की शुरुआत उन्हीं के विद्रोह से हुई थी।

18 अप्रैल, 1857 का दिन मंगल पांडे की फांसी के लिए निश्चित किया गया था। आपको बता दें, बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के खून से अपने हाथ रंगने से इनकार कर दिया।

तब कलकत्ता (कोलकाता) से चार जल्लाद बुलाए गए। 8 अप्रैल, 1857 के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया।

 

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