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अमिताभ बच्चन ने कुछ इस तरह दी अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि

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राजधानी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में भर्ती पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की तबीयत कई दिनों से नाजुक बनी हुई थी। कल शाम 5 बजे के करीब यह समाचार आया कि अटल अब नहीं रहे। काफी लोगों को एक धक्का लगा है कि अब अटल हमारे बीच नहीं रहे।

अटल के निधन के बाद से ही बॉलीवुड सेलेब्स सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। इस कड़ी में महानायक अमिताभ बच्चन ने भी उन्हें सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी। आपको बता दें कि अमिताभ बच्चन 1984 में इलाहाबाद से सांसद रहे थे। हालांकि, 1987 में बोफोर्स घोटाले नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। तब अटल जी ने उन्हें एक खास सलाह दी थी।

साभार – इंटरनेट

अमिताभ बच्चन ने श्रद्धांजलि देते हुए महानायक अमिताभ बच्चन ने लिखा- अटल बिहारी वाजपेयी (1924-2018) भावपूर्ण श्रधांजलि  ; एक महान नेता , प्रख्यात कवि ,अद्भुत वक्ता व प्रवक्ता  मिलनसार व्यक्तित्व । बाबूजी के प्रशंसक और बाबूजी उनके…

बोफोर्स घोटाला –

1987 में बोफोर्स घोटाले के चलते राजीव गांधी सरकार की फजीहत हुई थी। इलाहबाद से तत्कालीन सांसद और बॉलीवुड एक्टर अमिताभ बच्चन भी आरोपों से घिर गए। अमिताभ ने एक स्वीडिश अखबार पर इस घोटाले में उनका नाम घसीटने के लिए लंदन की कोर्ट में केस कर दिया। अमिताभ इस को केस जीत भी गए। अखबार को माफी मांगनी पड़ी लेकिन इसके बाद भी कई साल तक बोफोर्स घोटाले से अमिताभ का नाम जुड़ता रहा।

साल 1987 में बोफोर्स घोटाले के बाद अमिताभ बच्चन के इस्तीफा देने के बाद जब अटल जी से पूछा कि क्या आप समझते हैं कि बोफोर्स कांड में उनका भी कोई हाथ है।

इसके जवाब में अटल जी ने कहा- इस घोटाले में उनके भाई का नाम भी है। ऐसे में उन्हें जवाब देना होगा कि उनके भाई अपना कारोबार छोड़कर अचानक स्विटजरलैंड क्यों चले गए। उनके बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनकी फीस कहां से दी जा रही है। लेकिन, अभी तक कोई उत्तर नहीं दिया गया। शायद पीएम को बचाने के लिए उन्हें इस्तीफा देना पड़ा हो।

 

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पहले फेज के वोटर ने बिगाड़ा मोदी का मूड

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सच्चिदा नन्द द्विवेदी एडिटर-इन-चीफ

लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2024 का पहला चरण बीत गया। सात चरण में हो रहे चुनावों का ये सबसे बड़ा और पोलिटिकल पार्टीज के लिए लिटमस टेस्ट वाला चरण था। उत्तर प्रदेश की 8 सीटें वो थी जिन पर 2019 में भाजपा का पसीना छूट गया था।

जिस दिन अयोध्या में मर्यादा पुरषोत्तम राम के भव्य राम मंदिर में प्रभु राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई और उसे देख जिस तरह का जन-ज्वार उठा उससे गदगद होकर प्रधानमंत्री पीएम मोदी ने भाजपा और सहयोगी दलों के लिए 18वीं लोकसभा के लिए टारगेट सेट कर दिया 400 सीटों का और नारा दे दिया ‘अबकी बार 400 पार’। दरअसल ये 400 का टारगेट मोदी ने यूं ही नहीं सेट कर दिया। इसके पीछे कहीं न कहीं बीजेपी का कान्फिडन्स और विपक्ष को मानसिक दवाब में घेरने की रणनीति नजर आती है।

शुरुआत में जिस तरह से इंडि गठबंधन बिखरा बिखरा दिखाई दे रहा था उसे देखकर बीजेपी का ये टारगेट कठिन भी नजर नहीं आ रहा था लेकिन जैसे जैसे कयामत की रात यानि मतदान की तारीख पास आती गई विपक्षियों को भी अपने अस्तित्व पर संकट नजर आने लगा और फिर मरता क्या न करता के मुहावरे पर अमल करते हुए सभी एक हो ही गए। दूसरी तरफ बीजेपी को 2014 और 2019 की तरह मोदी मैजिक और राम के नाम पर भरोसा था और उधर उसके वोटर के मन में अबकी बार 400 पार इतना गहरा बैठ गया था कि लगता है उसका वोटर भी घर में बैठ गया और जो मतदान प्रतिशत 2019 में करीब 69 प्रतिशत था वो करीब 60 प्रतिशत पर आकर टिक गया। यानि 9 फीसदी वोटर गर्मी में ac की हवा खा रहा था।

फिर क्या था इन्हीं 9 प्रतिशत मतदाताओं ने सत्तारूढ़ दल यानि मोदी के माथे पर चिंता की सिलवटें ला दी, लेकिन ऐसा नहीं है ये सिलवटें सिर्फ मोदी के माथे पर ही आईं हों ये लकीरें विपक्षी गठबंधन के नेताओं के माथे पर भी थीं और हो भी क्यूँ नहीं क्योंकि evm खुलने के पहले कोई नहीं जानता कि जो वोटर घर में बैठा था वो आखिर कौन था। क्या वो सरकार से नाराज वो व्यक्ति था जिसे विपक्ष मतदान केंद्र तक लाने में सफल नहीं हो पाया या फिर ये वो आदमी था जिसे ये लग रहा था मैं वोट दूँ या न दूँ क्या फरक पड़ता है आएगा तो मोदी ही।

दरअसल उदासीनता की वजह को भी जानना जरूरी है-

2014 में बदलाव की लहर थी जनता भ्रष्टाचार की कहानियाँ सुनकर ऊब चुकी थी
2014 में मोदी पूरे देश के सामने गुजरात मॉडल लेकर आ रहे थे जिसे सोशल मीडिया के धुरंधरों ने हर फोन तक बखूबी पहुंचाया
2014 में मोदी ने जिस तरह देश को अपनी सभाओं से मथ के रख दिया उसका भी जनता पर काफी असर पड़ा
2019 में पुलवामा कांड ने राष्ट्रवाद को जगाया और 2014 में 282 सीट वाली बीजेपी 303 के आँकड़े पर पहुँच गई
लेकिन 2024 में न तो 2014 जैसे एंटी इन्कमबंसी जैसी लहर है और न 2019 जैसा राष्ट्रवाद जैसा

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