Connect with us

Monsoon Session Of Parliament 2018

मानसून सत्र : ‘जिन्ना हाउस’ को लेकर केंद्र सरकार ने संसद में कही ये बड़ी बात, सुनकर हैरान रह जाएंगे आप

Published

on

केंद्र सरकार ने शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 में भले ही संशोधन किया हो, लेकिन इस संशोधन का मुंबई के मालाबार हिल्स में स्थित मोहम्मद अली जिन्ना के घर पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। मुंबई स्थित जिन्ना हाउस शत्रु अधिनयम-1968 के दायरे में नहीं आता, बल्कि यह भारत सरकार की संपत्ति है।

सोमवार को लोकसभा में अश्विनी कुमार के प्रश्न के लिखित उत्तर में गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगराम अहीर ने यह जानकारी दी। सदस्य ने सवाल किया गया था कि क्या सरकार मोहम्मद अली जिन्ना हाउस को शत्रु संपत्ति मानती है?

हंसराज अहीर ने कहा कि,”जिन्ना का घर भारत सरकार की संपत्ति है और इसे गिराने या किसी को बेचने का सवाल ही नहीं उठता है। यह घर निष्क्रांत संपत्ति अधिनियम की धारा 1950 के अंतर्गत आता है।”

अली जिन्ना ने 1936 में इस घर को बनवाया था। उस वक्त इसके निर्माण पर 2 लाख रुपए खर्च हुए थे। जिन्ना को अपने इस बंगले से खासा लगावा था लेकिन बंटवारे के बाद उन्हें यह घर छोड़ना पड़ा। बंटवार के बाद जिन्ना पाकिस्तान चले गए। यह बंगला मुंबई के मालाबार हिल इलाके में स्थित है और इसके पास ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का निवास है।

जिन्ना चाहते थे कि इसे किसी विदेशी कांसुलेट ( खासतौर से उनकी पसंद किसी यूरोपियन दूतावास को देने की थी) को दे दिया जाए। जवाहरलाल नेहरू जी ने जिन्ना की बात मानकर उन्हें तीन हजार रुपए मासिक किराया देने का ऑफर दिया था। लेकिन जिन्ना की मौत सितंबर 1948 होने के कारण यह डील फाइनल नहीं हो पाई थी। जवाहर लाल नेहरू ने इस बंगले को शत्रु संपत्ति घोषित नहीं किया था।

Monsoon Session Of Parliament 2018

लोकसभा में पारित हुआ दिवालिया संहिता संशोधन विधेयक

Published

on

मानसून सत्र

नई दिल्ली। दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी), 2016 में घरेलू खरीदारों को वित्तीय लेनदारों के रूप में स्वीकारने के लिए लाए गए संशोधन को लोकसभा में मंगलवार को पारित कर दिया गया, जबकि विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि यह बदलाव केवल एक उद्योग की मदद के लिए किया गया है।

वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सभी मामलों के परिसमापन के बजाए उनका समाधान किया जाए। उन्होंने कहा कि दिवालियापन कानून समिति ने 26 मार्च को अपनी रिपोर्ट जमा की और समिति की हर सिफारिश को संशोधन में स्वीकार कर लिया गया है।

इस विधेयक को इस साल की शुरुआत में सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश की जगह लेने के लिए लाया गया है, जिसे गोयल ने 23 जुलाई को पेश किया था।

लोकसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान गोयल ने अपने जवाब में कहा, हम चाहते थे कि लाभ (समिति की सिफारिशों के) को तुरंत समाधान प्रक्रिया में शामिल किया जाए। मुझे लगता है कि सरकार का ध्यान समाधान पर होना चाहिए, तरलता पर नहीं। तरलता हमारा अंतिम विकल्प होना चाहिए। और प्रक्रिया में देरी से नौकरियों के नुकसान की संभावना अधिक है।

उन्होंने अध्यादेश लाने की आवश्यकता को भी घर खरीदारों के हितों की रक्षा से जोड़ा, जो अब वित्तीय लेनदारों के रूप में माने जाएंगे। उन्होंने कहा, घर खरीदारों के हितों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है और यही कारण है कि अध्यादेश लाया गया। हालांकि कोई भी प्रावधान पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया गया है, इसलिए किसी को भी व्यक्ति विशेष या उद्योग को लाभ पहुंचाने के लिए इसे लाने का कोई सवाल नहीं है।

उन्होंने कहा कि पूर्व सरकारों के दौरान, बड़े कर्जदारों ने वापस भुगतान करने की चिंता नहीं की थी, क्योंकि ऐसा माहौल बनाया गया था कि उन्हें लगता था कि कर्ज वसूलने की जिम्मेदारी बैंकों की ही है, न कि कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी उनकी है।

उन्होंने कहा, हमने उस स्थिति को बदल दिया है। अब, बड़े कर्जदारों द्वारा बैंकों से लिए गए कर्ज चुकाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले की प्रक्रिया के दौरान समाधान की लागत बहुत अधिक थी, जिसे अब कम किया गया है।

उन्होंने कहा, इससे पहले, वसूली की लागत नौ फीसदी थी और इसमें सात से आठ साल लगते थे। उसके बाद भी वसूली की प्रक्रिया अटक जाती थी। आईबीसी के तहत, वसूली की लागत को एक फीसदी से भी कम कर दिया गया है और औसत वसूली 55 फीसदी रही है, जबकि कुछ मामलों में 100 फीसदी तक वसूली की गई है।

Continue Reading
Advertisement Aaj KI Khabar English

Trending