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Monsoon Session Of Parliament 2018

ये पहली बार नहीं था, इससे पहले भी आँखें मटका चुके हैं राहुल, वीडियो देखें

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नई दिल्ली। 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र में विपक्ष ने केंद्र सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की। इस चर्चा के दौरान दोनों दलों में तीखी नोकझोक देखने को मिली। राहुल गांधी ने जमकर सरकार और पीएम मोदी पर निशाना साधा, जिसका प्रधानमंत्री मोदी ने बड़े ज़ोरदार तरीके से जवाब भी दिया। इन सब में संसद को कुछ विचित्र नज़ारे भी देखने को मिले। जैसे, राहुल गांधी का पीएम मोदी के गले लगना और राहुल गांधी का आंखें मटकाना। लेकिन राहुल ने पहली बार ऐसी हरकत नहीं की है। राहुल ऐसा पहले भी कर चुके हैं।

2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस महज 44 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी। 16 मई 2014 को चुनाव नतीजों की घोषणा के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मीडिया को संबोधित करते हुए अपनी हार स्वीकार की और नई सरकार को बधाई दी थी।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे पहले राहुल गांधी ने अपना बयान दिया। उनके बाद सोनिया गांधी ने अपनी बात रखी और राहुल गांधी उनकी बाईं तरफ खड़े हो गए। इस दौरान जब सोनिया गांधी अपना वक्तव्य दे रही थीं, तो इसी बीच राहुल गांधी सामने खड़े मीडियाकर्मियों की तरफ देखकर आंख मारने लगे।

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लोकसभा में पारित हुआ दिवालिया संहिता संशोधन विधेयक

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मानसून सत्र

नई दिल्ली। दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी), 2016 में घरेलू खरीदारों को वित्तीय लेनदारों के रूप में स्वीकारने के लिए लाए गए संशोधन को लोकसभा में मंगलवार को पारित कर दिया गया, जबकि विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि यह बदलाव केवल एक उद्योग की मदद के लिए किया गया है।

वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सभी मामलों के परिसमापन के बजाए उनका समाधान किया जाए। उन्होंने कहा कि दिवालियापन कानून समिति ने 26 मार्च को अपनी रिपोर्ट जमा की और समिति की हर सिफारिश को संशोधन में स्वीकार कर लिया गया है।

इस विधेयक को इस साल की शुरुआत में सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश की जगह लेने के लिए लाया गया है, जिसे गोयल ने 23 जुलाई को पेश किया था।

लोकसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान गोयल ने अपने जवाब में कहा, हम चाहते थे कि लाभ (समिति की सिफारिशों के) को तुरंत समाधान प्रक्रिया में शामिल किया जाए। मुझे लगता है कि सरकार का ध्यान समाधान पर होना चाहिए, तरलता पर नहीं। तरलता हमारा अंतिम विकल्प होना चाहिए। और प्रक्रिया में देरी से नौकरियों के नुकसान की संभावना अधिक है।

उन्होंने अध्यादेश लाने की आवश्यकता को भी घर खरीदारों के हितों की रक्षा से जोड़ा, जो अब वित्तीय लेनदारों के रूप में माने जाएंगे। उन्होंने कहा, घर खरीदारों के हितों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है और यही कारण है कि अध्यादेश लाया गया। हालांकि कोई भी प्रावधान पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया गया है, इसलिए किसी को भी व्यक्ति विशेष या उद्योग को लाभ पहुंचाने के लिए इसे लाने का कोई सवाल नहीं है।

उन्होंने कहा कि पूर्व सरकारों के दौरान, बड़े कर्जदारों ने वापस भुगतान करने की चिंता नहीं की थी, क्योंकि ऐसा माहौल बनाया गया था कि उन्हें लगता था कि कर्ज वसूलने की जिम्मेदारी बैंकों की ही है, न कि कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी उनकी है।

उन्होंने कहा, हमने उस स्थिति को बदल दिया है। अब, बड़े कर्जदारों द्वारा बैंकों से लिए गए कर्ज चुकाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले की प्रक्रिया के दौरान समाधान की लागत बहुत अधिक थी, जिसे अब कम किया गया है।

उन्होंने कहा, इससे पहले, वसूली की लागत नौ फीसदी थी और इसमें सात से आठ साल लगते थे। उसके बाद भी वसूली की प्रक्रिया अटक जाती थी। आईबीसी के तहत, वसूली की लागत को एक फीसदी से भी कम कर दिया गया है और औसत वसूली 55 फीसदी रही है, जबकि कुछ मामलों में 100 फीसदी तक वसूली की गई है।

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