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ऑफ़बीट

अपनी लाडली बेटी हनीप्रीत से रखवाता था राम रहीम करवाचौथ का व्रत, ऐसे खुली थी पोल

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नई दिल्ली। देश में रविवार को करवाचौथ मनाया जा रहा है। करवाचौथ में महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। करवाचौथ के पर्व से डेरा प्रमुख गुरमीत रहीम भी अछुता नहीं था।

एक वक्त था जब डेरा परिसर में डेरा प्रमुख गुरमीत रहीम के भक्त उसके लिए करवाचौथ का व्रत रखती थी। इतना ही नहीं बलात्कारी बाबा राम रहीम करवाचौथ को लेकर भव्य आयोजन किया करता था।

करवाचौथ पर महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र और सलामती के लिए व्रत रखती हैं। लेकिन, गुरमीत राम रहीम अपने भक्तों का पिताजी होने के बावजूद उनसे अपने लिए व्रत रखवाता था। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो, डेरा प्रमुख गुरमीत अपनी लंबी उम्र के लिए महिला समर्थकों से व्रत रखने के लिए मजबूर करता था।

इतना ही नहीं स्कूल जाने वाली छोटी बच्चियों से भी बाबा व्रत रखवाने के लिए कहा करता था। बलात्कारी बाबा राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद कुछ इसी तरह का वीडियो भी सोशल मीडिया पर जारी हो चुका था।

इस वीडिया में सामूहिक तौर पर अपनी महिला समर्थकों के व्रत खुलवाता बलात्कारी बाबा राम रहीम नजर आ रहा था। ऐसे में रविवार को पूरे देश में करवाचौथ का व्रत रखा जा रहा है लेकिन डेरा परिसर में एकदम सन्नाटा पसरा हुआ है। बाबा राम रहीम के साथ-साथ अब उसकी मुंहबोली बेटी भी जेल की हवा खा रही है।

ऐसे में बाबा और हनीप्रीत के लिए यह करवाचौथ बेहद दुखदायी बन गया है। करवाचौथ वाले दिन महिलाओं को खास तौर पर लाल-पीले-गुलाबी रंग के कपड़े पहनने चाहिए। बता दें कि इस दिन महिलाओं को नीले, भूरे, सफेद और काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

बता दें कि 25 अगस्त को गुरमीत राम रहीम को अपनी ही दो साध्वियों से रेप का दोषी पाया। इस गुनाह के लिए बाबा को 20 साल जेल की सजा सुनाई गई। कुल मिलाकर बाबा राम रहीम और हनीप्रीत के लिए करवाचौथ अब केवल याद में रह गया है।

 

आध्यात्म

जन्माष्टमी स्पेशल : सिर्फ भगवान ही नहीं, क्यों सबसे महान भी हैं श्री कृष्ण, जानिए पूरी कहानी

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यशोदा नंदन, देवकी पुत्र भारतीय समाज में कृष्ण के नाम से सदियों से पूजे जा रहे हैं। तार्किकता के धरातल पर कृष्ण एक ऐसा एकांकी नायक हैं, जिसमें जीवन के सभी पक्ष विद्यमान है। कृष्ण वो किताब हैं जिससे हमें ऐसी कई शिक्षाएं मिलती हैं जो विपरीत परिस्थिति में भी सकारात्मक सोच को कायम रखने की सीख देती हैं।

कृष्ण के जन्म से पहले ही उनकी मृत्यु का षड्‍यंत्र रचा जाना और कारावास जैसे नकारात्मक परिवेश में जन्म होना किसी त्रासदी से कम नहीं था । परन्तु विपरीत वातावरण के बावजूद नंदलाला, वासुदेव के पुत्र ने जीवन की सभी विधाओं को बहुत ही उत्साह से जीवंत किया है। श्री कृष्ण की संर्पूण जीवन कथा कई रूपों में दिखाई पङती है।

नटवरनागर श्री कृष्ण उस संर्पूणता के परिचायक हैं जिसमें मनुष्य, देवता, योगीराज तथा संत आदि सभी के गुण समाहित हैं। समस्त शक्तियों के अधिपति युवा कृष्ण महाभारत में कर्म पर ही विश्वास करते हैं। कृष्ण का मानवीय रूप महाभारत काल में स्पष्ट दिखाई देता है। गोकुल का ग्वाला, बिरज का कान्हा, धर्म की रक्षा के लिए रिश्तों के मायाजाल से दूर, मोह-माया के बंधनों से अलग है।

कंस हो या कौरव-पांडव, दोनों ही निकट के रिश्ते, फिर भी कृष्ण ने इस बात का उदाहरण प्रस्तुत किया कि धर्म की रक्षा के लिए रिश्तों के बजाय कर्तव्य को महत्व देना आवश्यक है। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कर्म प्रधान गीता के उपदेशों को यदि हम व्यवहार में अपना लें तो हम सब की चेतना भी कृष्ण सम विकसित हो सकती है।

कृष्ण का जीवन दो छोरों में बंधा है। एक ओर बांसुरी है, जिसमें सृजन का संगीत है, आनंद है, अमृत है और रास है। तो दूसरी ओर शंख है, जिसमें युद्ध की वेदना है, गरल है तथा निरसता है। ये विरोधाभास ये समझाते हैं कि सुख है तो दुःख भी है।

यशोदा नंदन की कथा किसी द्वापर की कथा नहीं है, किसी ईश्वर का आख्यान नही है और ना ही किसी अवतार की लीला। वो तो यमुना के मैदान में बसने वाली भावात्मक रुह की पहचान है। यशोदा का नटखट लाल है तो कहीं द्रोपदी का रक्षक, गोपियों का मनमोहन, तो कहीं सुदामा का मित्र। हर रिश्ते में रंगे कृष्ण का जीवन नवरस में समाया हुआ है।

माखन चोर, नंदकिशोर के जन्म दिवस पर मटकी फोङ प्रतियोगिता का आयोजन, खेल-खेल में समझा जाता है कि किस तरह स्वयं को संतुलित रखते हुए लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है; क्योंकि संतुलित और एकाग्रता का अभ्यास ही सुखमय जीवन का आधार है। सृजन के अधिपति, चक्रधारी मधुसूदन का जन्मदिवस उत्सव के रूप में मनाकर हम सभी में उत्साह का संचार होता है और जीवन के प्रति सृजन का नजरिया जीवन को खुशनुमा बना देता है।

कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, पर राज उन्होंने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होंने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी द्वारका में उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

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