यथार्थ गीता: लोक में दो प्रकार के पुरूष हैं
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Monday, Apr 30 2012 8:02PM IST

यहाँ कहते हैं- मैं वेदवित हूँ। उन वेदविदों में अपनी भी गणना करते हैं। अत: श्रीकृष्ण भी यहॉँ वेदवित पुरूषोत्तम हैं, जिसे पाने का अधिकार मानवमात्र को है।
अन्त में उन्होने बताया कि लोक में दो प्रकार के पुरूष हैं। भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर क्षर हैं। मन की कूटस्थ अवस्था में यही पुरूष अक्षर है; किन्तु है द्वन्द्वात्मक और इससे भी परे जो परमात्मा, परमेश्वर, अव्यक्त और अविनाशी कहा जाता है, वह वस्तुत: अन्य ही है।
यह क्षर-अक्षर से परेवाली अवस्था है, यही परमस्थिति है। इससे संगत करते हुए कहते हैं कि मैं भी क्षर-अक्षर से परे वही हूँ, इसलिये लोग मुझे पुरूषोत्तम कहते हैं। इस प्रकार उत्तम पुरूष को जो जानते हैं वे ज्ञानी भक्तजन सदैव, सब ओर से मुझे ही भजते हैं। उनकी जानकारी में अन्तर नहीं है।
अर्जुन! यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य मैंने तेरे प्रति कहा। प्राप्तिवाले महापुरूष सबके सामने नहीं करते; किन्तु अधिकारी से दुराव भी नहीं रखते। अगर दुराव करेंगे तो वह पायेगा कैसे?
इस अध्याय में आत्मा की तीन स्थितियों का चित्रण क्षर, अक्षर और अति उत्तम पुरूष के रूप में स्पष्ट किया गया, जैसा इससे पहले किसी अन्य अध्याय में नहीं है। अत:-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘पुरूषोत्तमयोगो’ नाम पञ्चदशोSध्याय:।।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में ‘पुरूषोत्तम योग’ नामक पन्द्रहवॉँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीताया: ‘यथार्थ गीता’ भाष्ये ‘पुरूषोत्तमयोगो’ नाम पञ्चदशोSध्याय:।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘पुरूषोत्तम योग’ नामक पन्द्रहवॉँ अध्याय समाप्त होता है।
।। हरि ॐ तत्सत्।।