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यथार्थ गीता: ब्रह्मविद्या से संयुक्त बुद्धि ही ब्रह्मा है
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Saturday, Apr 28 2012 8:54PM IST
पौराणिक आख्यान है कि एक बार कमल के आसन पर बैठे हुए ब्रह्माजी ने विचार किया कि मेरा उद्गम क्या है? जहॉँ से वे पैदा हुए थे, उस कमल-नाल में प्रवेश करते चले गये। अनवरत चलते रहे; किन्तु अपना उद्गम न देख सके। तब हताश होकर वे उसी कमल के आसन पर बैठ गये। चित्त का निरोध करने में लग गये और ध्यान के द्वारा उन्होंने अपना मूल उद्गम पा लिया, परमतत्त्व का साक्षात्कार किया, स्तुति की। परमस्वरूप से ही आदेश मिला कि- मैं हूँ तो सर्वत्र; किन्तु मेरी प्राप्ति का स्थान मात्र ह्रदय है। ह्रदय-देश में जो ध्यान करता है, वह मुझे प्राप्त कर लेता है।

ब्रह्मा एक प्रतीक है। योग-साधना की एक परिपक्व अवस्था में इस स्थिति की जागृति है। ईश्वर की ओर उन्मुख ब्रह्मविद्या से संयुक्त बुद्धि ही ब्रह्मा है। कमल पानी में रहते हुए भी निर्मल और निर्लेप रहता है। बुद्धि जब तक इधर-उधर ढूँढ़ती है, तब तक नहीं पाती और जब वही बुद्धि निर्मलता के आसन पर आसीन होकर मनसहित इन्द्रियों का समेटकर ह्रदय-देश में निरोध कर लेती है, उस निरोध के भी विलीनीकरण की अवस्था में अपने ही ह्रदय में परमात्मा को पा लेती है।

यहॉँ भी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अनुसार संसार वृक्ष है, जिसका मूल सर्वत्र है और शाखाऍं सर्वत्र है। ‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’- कर्मों के अनुसार केवल मनुष्य-योनि में बन्धन तैयार करता है, बॉँधता है। अन्य योनियॉँ तो इन्हीं कर्मों के अनुसार भोग भोगती हैं। अत: दृढ़ वैराग्यरूपी शस्त्र द्वारा इस संसाररूपी पीपल के वृक्ष को तू काट और उस परमपद को ढूँढ़, जिसमें गये हुए महर्षि पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते।

कैसे जाना जाय कि संसार-वृक्ष कट गया? योगेश्वर कहते हैं कि जो मान और मोह से सर्वथा रहित है, जिसने संगदोष जीत लिया है, जिसकी कामनाऍं निवृत्त हो गई हैं और जो द्वन्द्व से मुक्त है, वह पुरूष उस परमतत्त्व को प्राप्त होता है। उस परमपद को न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर पाते हैं, वह स्वयं प्रकाशरूप है। जिसमें गये हुए पीछ लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है, जिसे पाने का अधिकार सबको है, क्योंकि वह जीवात्मा मेरा ही शुद्ध अंश है।