Google+
Aaj Ki Khabar  Aaj Ki Khabar
Updated
यथार्थ गीता: कूटस्थ पुरूष अविनाशी कहा जाता है
टैग:
Monday, Apr 23 2012 3:20PM IST
मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ। मुझसे ही स्वरूप की स्मृति (सुरति, जो तत्त्व परमात्मा विस्मृत है उसका स्मरण हो आना) होती है। (प्राप्तिकाल का चित्रण है) स्मृति के साथ ही ज्ञान है (साक्षात्कार) और ‘अपोहनं’ अर्थात् बाधाओं का शमन मुझ इष्ट से ही होता है। सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। वेदान्त का कर्त्ता अर्थात् ‘वेदस्य अन्त: स: वेदान्त’ (अलग था तभी तो जानकारी हुई। जब जानते ही उसी स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गया, तो कौन किसको जाने?)

वेद की अन्तिम स्थिति का कर्त्ता मैं ही हूँ और ‘वेदविदित’ अर्थात् वेद ज्ञाता भी मैं ही हूँ। अध्याय के आरम्भ में उन्होने कहा है कि संसार वृक्ष है। ऊपर परमात्मा मूल और नीचे प्रकृतिपर्यन्त शाखाएँ हैं। जो इसे मूल से प्रकृति का विभाजन करके जानता है, मूल जानता है वह वेदवित है।

यहॉं कहते हैं कि मैं वेदवित हूँ। उसे जो जानता है, श्रीकृष्ण ने अपने को उसकी तुलना में खड़ा किया कि वह वेदवित है, मैं वेदवित हूँ। श्रीकृष्ण भी एक तत्त्वज्ञ महापुरूष, योगियों के भी परमयोगी थे। यहॉँ यह प्रश्न पूरा हुआ। अब बताते हैं कि संसार में पुरुष का स्वरूप दो प्रकार का है-

द्वाविमौ पुरूषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।

क्षर: सर्वाणि भतानि कूटस्थोSक्षर उच्यते।।


अर्जुन! इस संसार में ‘क्षर’-क्षय होनेवाले, परिवर्तनशील और ‘अक्षर’-अक्षय, अपरिवर्तनशील ऐसे दो प्रकार के पुरूष हैं। उनमें सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों) के शरीर तो नाशवान् हैं, क्षर पुरूष हैं, आज हैं तो कल नहीं रह जायेंगे और दूसरा कूटस्थ पुरूष अविनाशी कहा जाता है।

साधन के द्वारा मनसहित इन्द्रियों का निरोध अर्थात् जिसकी इन्द्रिय समूह कूटस्थ है, वही अक्षर कहलाता है। अब आप स्त्री कहलाते हों अथवा पुरूष, यदि शरीर और शरीर-जन्म के कारण संस्कारों का क्रम लगा है तो आप क्षर पुरूष हैं और जब मनसहित इन्द्रियॉँ कूटस्थ हो जाती हैं तब वही अक्षर पुरूष कहलाता है। किन्तु यह भी पुरूष की अवस्था-विशेष ही है। इन दोनों से भी परे एक अन्य पुरूष भी है-