श्रीकृपालु जी महाराज: पाप करके न मानना बड़ा पाप है

श्रीकृपालु जी महाराज: पाप करके न मानना बड़ा पाप है

और अज्ञान क्यों है? माया से। और माया को हटाने की पावर किसी योगी ज्ञानी में भी नहीं है। तो महाराज! फिर इस बेचारे की क्या गलती है? इसने जो गलती की वो करनी चाहिये, सभी करते हैं। जितने मायाधीन जीव हैं जिनको भगवत्प्राप्ति नहीं हुई वो सब गलती करते हैं, पाप करते हैं। न मानें ये और बड़ा पाप है। गलती भी करे और गलती माने भी न। हॉँ ऐसे हैं हम लोग। विचित्र। इसीलिये मैंने वो दोहा बना दिया है-

‘ऐसे पतित विचित्र को’

कि हम अपराधी हैं और अपने को अपराधी नहीं मानते। लड़ जायें अगर कोई बोले तो। तुम कामी हो, क्रोधी हो, लोभी हो, मोही हो, पापात्मा हो। एक शब्द भी हम सुनने को तैयार नहीं। और हैं सब। हॉँ, हॉँ हैं तो। तो भगवान् की वो कृपा जिससे माया जाये, अज्ञान जाये, भगवान् का वो सब सामान मिले जिससे भगवान् का ग्रहण हो, ये कैसे हो? और ऐसा तो हो नहीं सकता जी कि कोई शर्त न हो?

क्योंकि अगर कोई शर्त न होती तो फिर सबको भगवत्प्राप्ति हो जाती। सब जगद्गुरू शंकराचार्य, निम्बार्काचार्य, रामानुजाचार्य,माध्वाचार्य, तुलसी, सूर, मीरा, कबीर, नानक, तुकाराम बन जाते। हम लोगों को क्यों चौरासी लाख में घुमाया जा रहा है? और कुछ लोगों को अपने पास बुला लिया, अपना ज्ञान आनन्द दे दिया। इसका मतलब कुछ शर्त जरूर है। वो वेदों शास्त्रों के द्वारा जानना पड़ेगा वो शर्त क्या है? फिर बतायेंगे।

।।लाडिली लाल की जय।।

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