श्रीकृपालु जी महाराज: मनुष्य अज्ञान के कारण अपराध करता है
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Sunday, Apr 15 2012 6:22PM IST

और लॉजिक से भी बात समझ में आती है कि भई हमारे पास तो ऐसी कोई दिव्य वस्तु है नहीं, जिससे हम भगवान् को पकड़ लें। अरे हमारा शरीर और शरीर के अन्दर वाली इन्द्रियॉँ, मन, बुद्धि ये सब पंचमहाभूत के माया के विकार हैं और हम इससे परे दिव्य भगवान् के अंश हैं।
तो हमको कौन जानेगा और फिर भगवान् को? ये तो कल्पना भी करना पागलपन है। तो भगवान् को भगवान् की कृपा से जाना जा सकता है। ये बात समझ में बैठेगी, बैठ गई। तो, अब और समस्या खड़ी हो गई कि साहब देखिये फिर तो ऐसा है कि जब वो कृपा करेंगे तो फिर हो गया, हम क्या करें? हमारी गलती क्या जो हमको चौरासी लाख में घुमाया जा रहा है?
अरे जब वो कृपा करेंगे तो उनको जानेंगे, तो उनमें विश्वास होगा, तो उनसे प्रेम होगा तो वो कृपा करेंगे। तो पहले भी कृपा बाद में भी कृपा। जब हम जान नहीं सकते तो हम अपराध करेंगे ही और करेंगे क्या? जब जयन्त ने चोंच मारा था सीता के ह्रदय में और बेचारा त्रैलोक्य में घूमा किसी ने क्षमा नहीं किया तो फिर आया राम के पास। तो राम ने कहा मैं क्षमा नहीं कर सकता। जो सीता जी ने कहा पतिदेव से एक बात कहूँ। हॉँ कहो-
‘न कश्चिन्नापराध्यति।’
जब तक आपकी कृपा न हो और माया न जाये तब तक क्या कोई बिना अपराध किये रह सकता है? अरे अपराध क्यों करता है मनुष्य? अज्ञान से।