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सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण मायिक हैं
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Thursday, Apr 26 2012 8:15PM IST
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां सर्वोपनिषदामपि।

हमसे लोगों ने कहा कि सब जगदगुरूओं ने वेदान्त पर भाष्य लिखा है। शंकराचार्य ने शुरू किया पहले। भाष्य माने मतलब। अर्थ। क्योंकि वो छोटे-छोटे सूत्र हैं-

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।



हो गया।



जन्माद्यस्य यत:।

हो गया।

‘तत्तु समन्वयात’

स्मृतेश्च।


हो गया।



‘स्मरन्ति च’



हो गया।

दर्शनाच्च।

हो गया। ऐसे ऐसे सूत्र हैं दो दो शब्द के और उनका अर्थ बड़ा लम्बा लिखा है इन लोगों ने। एक सूत्र का अर्थ ढाई सौ पेज में। अब इतना कौन पढे़, कौन समझे ? तो इसका जो अर्थ है सब जगदगुरूओं ने लिखा है थोड़ा-थोड़ा अन्तर है। खाली शंकराचार्य से बहुत ज्यादा अन्तर हैं। उलटा है बिल्कुल। शंकराचार्य ने अपने भाष्य में लिखा है कि सगुण साकार भगवान श्रीकृष्ण मायिक हैं। सत्त्वगुणी हैं, ब्रह्म नहीं हैं और श्रीकृष्ण की भक्ति भी किया है। दोनों बातें हैं उनकी। वो मैंने आपको कई बारा बताया है कि वो भगवान श्रीकृष्ण की जो आज्ञा थी उसी के अनुसार उन्होंने ये सब किया है। लेकिन भागवत को नहीं छुआ, शंकराचार्य ने। क्योंकि अगर भागवत का भाष्य लिखते तब तो पहले ही उनको मानना पड़ता श्रीकृष्ण ब्रह्म के बाप हैं। बाप माने प्रतिष्ठा, आश्रय। मैंने बार-बार आपको बताया है कि ब्रह्म का आश्रय भगवान हैं, श्रीकृष्ण हैं। परमात्मा का आश्रय श्रीकृष्ण हैं। समस्त अवतारों का आश्रय श्रीकृष्ण हैं सब उन्हीं से सम्बद्ध हैं और उन्हीं के अण्डर में हैं। तो मैंने कहा कि जब वेदव्यास ने स्वय लिखा है गरुड़ पुराण में सब लोग ध्यान से समझो।