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ब्रह्मसूत्र और उपनिषद इन सबका सार है भागवत
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Wednesday, Apr 25 2012 7:11PM IST
कृपा के लिये हमको भी कुछ करना होगा। देखो, कोई वस्तु सामने है लेकिन देखने के लिये क्या चाहिये ? ऑंख। ऑंख में मोतियाबिन्द न हो, ठीक ठाक हो ऑंख। तो सामने की वस्तु दिखाई पड़ती है। हॉं। लेकिन अँधेरा हो तो ? तो नहीं दिखाई पड़ती। और बढिया ऑंख है। अरे वो कितनी ही बढिया हो जी। अँधेरे में नहीं दिखाई पड़ती कोई चीज। तो इसका मतलब प्रकाश भी हो और ऑंख भी ठीक हो। हॉँ। दोनों कम्पलसरी हैं। तो उसी प्रकार वेद कहता है

तप:प्रभावाद देवप्रसादाच्च

तप और कृपा मिक्श्चर होकर के यानी हम भी चलें कुछ दूर वो भी आवें कुछ दूर तब मिलन हो। अपनी जगह खड़े रहेंगे तो नहीं होगा। अरे तो हम कहॉँ तक जायेंगे ? जहॉँ तक जा सकें, जायें। जब थक जायेंगे तो वो हमको मिल जायेगा। क्या मतलब ? मतलब हमको भी कुछ करना है तब वो कृपा मिलेगी। क्या करना है हमको ? वेदों के पास चलो। वेदों ने उपनिषदों में, वेदों का जो उत्तर भाग है उसको उपनिषद कहते हैं। समझ लो सब लोग कि क्या बलाय है उपनिषद् ? जिसकी तारीफ मैक्समूलर, शॉँपनहावर बड़ें-बड़ें विदेशी लोगों ने की है कि उपनिषद तो सूर्य के समान हैं और देशों की जो फिलॉँसफी है वो किरन के समान है। तो उपनिषद वेदों का उत्तर भाग है। उसका सार और उपनिषदों का सार है वेदान्त, ब्रह्मसूत्र जो हम बोलते हैं न वेदव्यास का। ब्रह्मसूत्र और उपनिषद इन सबका सार है भागवत। गरूड़ पुराण में कहा गया है-