भगवान् के सदा असंख्य‍ अवतार होते रहते हैं

अनेक वेद मंत्रों में श्रीकृष्‍ण को ही परब्रह्म माना है। शंकर ने भी अनेक स्‍थलों पर श्रीकृष्‍ण को भगवान् ही

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ब्रह्म का सगुण साकार स्वरूप सृष्टि के पूर्व ही सनातन है

इस ब्रह्मसूत्र के भाष्‍य में भी शंकर ने लिखा है। यथा – यदा स सशरीरतां संकल्‍पयति तदा सशरीरो भवति। यदा

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यह सब कार्य सगुण साकार भगवान् ही कर सकते हैं

सृष्टि पूर्व हरि देखत, सोचत मृदु मुसकात । सगुण रूप साकार नित, वेद विदित विख्‍यात ।। 55 ।। भावार्थ- कुछ

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राधा जी को श्रीकृष्ण माधुर्य रस के पान का सौभाग्य प्राप्त था

एक बार पुनः खेलते हुये नन्‍दललन को अपना प्रतिबिंब दिखाई पड़ा। बस फिर क्‍या था- उसे चिपटाने के लिए बार-बार

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