यह सब कार्य सगुण साकार भगवान् ही कर सकते हैं

सृष्टि पूर्व हरि देखत, सोचत मृदु मुसकात । सगुण रूप साकार नित, वेद विदित विख्‍यात ।। 55 ।। भावार्थ- कुछ

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राधा जी को श्रीकृष्ण माधुर्य रस के पान का सौभाग्य प्राप्त था

एक बार पुनः खेलते हुये नन्‍दललन को अपना प्रतिबिंब दिखाई पड़ा। बस फिर क्‍या था- उसे चिपटाने के लिए बार-बार

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श्रीकृष्ण अपने रूप पर स्व‍यं मुग्ध हो जाते हैं

करन चहत आलिंगन, आपुहिँ आपु निहार । जन-मन-मोहन ही नहीं, निज मन-मोहन हार ।।53 ।। भावार्थ- श्रीकृष्‍ण का माधुर्य रस

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ब्रह्म का आनन्द चेतन है

यह ब्रह्म रस रूप में आस्‍वाद्य एवं आस्‍वादक दोनों है। पूर्व में बता चुके हैं कि ब्रह्म में अनन्‍त स्‍वाभाविक

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