राधा जी को श्रीकृष्ण माधुर्य रस के पान का सौभाग्य प्राप्त था

एक बार पुनः खेलते हुये नन्‍दललन को अपना प्रतिबिंब दिखाई पड़ा। बस फिर क्‍या था- उसे चिपटाने के लिए बार-बार

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श्रीकृष्ण अपने रूप पर स्व‍यं मुग्ध हो जाते हैं

करन चहत आलिंगन, आपुहिँ आपु निहार । जन-मन-मोहन ही नहीं, निज मन-मोहन हार ।।53 ।। भावार्थ- श्रीकृष्‍ण का माधुर्य रस

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ब्रह्म का आनन्द चेतन है

यह ब्रह्म रस रूप में आस्‍वाद्य एवं आस्‍वादक दोनों है। पूर्व में बता चुके हैं कि ब्रह्म में अनन्‍त स्‍वाभाविक

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ज्ञाता के बिना ज्ञान रह ही नहीं सकता

जैसे दीपक प्रभा भी है एवं प्रभावान् भी है । ऐसे ही आत्‍मा ज्ञाता भी है । एवं ज्ञान स्‍वरूप

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भक्ति को ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं है

अर्थात् एक गो‍पी श्‍यामसुन्‍दर के अनन्‍त सौन्‍दर्य रसपान में इतनी मुग्‍ध हो गई कि आँखों में आनन्‍द के अश्रु आ

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