नागरिक भागीदारी के जरिए भारतीय लोकतंत्र बनेगा विश्व में अगुआ

ट्रंप की टिप्पणी में मोदी के साथ मुलाकात का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने नहीं आया। इस मुलाकात में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं थी कि दोनों नेता सोशल मीडिया के मामले में अग्रणी हैं, बल्कि इसमें खास यह था कि दोनों विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के मुखिया हैं।

240 वर्ष से अधिक समय पूर्व अमेरिका की एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापना की गई थी, और पिछले करीब 100 वर्षो से यह विश्वभर में लोकतंत्र का अगुआ रहा है।

जबकि इसके विपरीत भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य का इतिहास केवल 70 वर्ष पुराना है। कई वर्षो तक भारत लोकतांत्रिक आचरण के उदाहरण के लिए अमेरिका की ओर ताकता रहा है।

लेकिन, अमेरिका और दुनियाभर में बदलते हालातों के कारण, आज हम एक निर्णायक बिंदु पर हैं। भारत के पास वैश्विक अगुआ और समूचे विश्व के लिए एक उदाहरण बनने का मौका है। जैसा कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लोकतंत्रों और लोकतांत्रिक मूल्यों की पूर्ण क्षमता प्रदर्शित करने के लिए भारत को अमेरिका का ‘परमावश्यक’ साझीदार बताया था।

भारत के पिछले आम चुनाव में मतदाताओं की 70 प्रतिशत से अधिक भागीदारी से साबित हुआ था कि भारत नेतृत्व की इस जिम्मेदारी को स्वीकारने के लिए तैयार है। यह दर्जा हासिल करने के लिए भारत को एक और कदम की जरूरत है, जो नागरिक भागीदारी से ही संभव है।

इस समय नागरिक भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि विश्वभर के लोकतंत्रों में युवाओं के बीच लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणालियों के समर्थन और अनुमोदन में नाटकीय ढंग से गिरावट आई है।

हार्वर्ड के एक शोधकर्ता और यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के एक शोधकर्ता ने ‘जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी’ के जनवरी संस्करण में प्रकाशित एक लेख में भी यही बात लिखी थी। शोधकर्ताओं ने लिखा था कि अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे ‘स्थिर उदार लोकतंत्रों’ के रवैये में इस सहस्त्राब्दि में नकारात्मक रुख नजर आ रहा है।

शोधकर्ताओं ने इस मामले में भारत पर शोध नहीं किया। लेकिन मेरा मानना है कि मेरी मातृभूति में सच्चाई इसके उलट है। भारत में लोकतंत्र अभी भी शैशवकाल में ही है।

हालांकि, इन वर्षो में कई बुरे अनुभव और समस्याएं सामने आईं, लेकिन भारत ने मजबूत प्रगति की है और देश लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ मजबूत संबंध बनाने के लिए तैयार है। इसे दिशा और दशा देने में जागरूक नागरिकों की भागीदारी से भारत दुनियाभर में अपने लोकतंत्र का प्रकाश फैला पाएगा।

कई बार जब मैं नागरिक भागीदारी की बात करता हूं तो लोग उसे राजनीतिक भागीदारी समझ लेते हैं। राजनीतिक भागीदारी केवल एक प्रकार की नागरिक भागीदारी है, जिसमें हमें निवेश करना चाहिए, ताकि हम अपने समाज और भारत को एक बेहतर स्थान बना पाएं।

नागरिक भागीदारी पांच रूपों में होती है : व्यक्तिगत भागीदारी, संस्थागत भागीदारी, राजनीतिक भागीदारी, सामुदायिक भागीदारी और सामाजिक भागीदारी।

मैं इन रूपों को संक्षेप में परिभाषित करता हूं :

व्यक्तिगत भागीदारी का अर्थ खुद सर्वश्रेष्ठ होने और अपने कृत्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होने से है।

संस्थागत भागीदारी उन समूहों की सफलता में योगदान करती है, जिनसे लोग संबंधित होते हैं, जैसे कि जिस स्थान पर आप काम करते हैं, जहां आप पूजा करते हैं और जहां से संबंधित होते हैं।

राजनीतिक भागीदारी यानी उन प्रक्रियाओं में भागीदारी करना, जो सरकार के ढांचे और प्रकृति को आकार देती हैं।

सामुदायिक भागीदारी का अर्थ है स्थानीय और वैश्विक जगत को, एक बेहतर स्थान बनाना, जिसमें हम रहते हैं।

सामाजिक भागीदारी का अर्थ है सभी के लिए न्याय और समान व्यवहार और अवसर की अनुशंसा करना।

राष्ट्रपति ट्रंप ने यह तो कहा ही था कि वह और प्रधानमंत्री मोदी सोशल मीडिया में वैश्विक अगुआ हैं, साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि इससे हमारे देशों के नागरिकों को अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से और हमें उनसे सीधे संवाद करने का मौका मिलता है।

दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के प्रमुखों की जिम्मेदारियां सोशल मीडिया में अग्रणी होने से कहीं अधिक बड़ी हैं।

दोनों नेताओं पर अपने राष्ट्र को नागरिक भागीदारी का एक ऐसा मॉडल बनाने की जिम्मेदारी है, जिसमें नस्ल, धर्म, पृष्ठभूमि और मान्यताओं से परे सभी नागरिकों को पूर्ण और समान अधिकार प्राप्त हो।

राष्ट्रपति ट्रंप के विचारहीन और आत्मकेंद्रित ट्वीट्स से नहीं लगता कि वह नेतृत्व की इस भूमिका को समझ पा रहे हैं। जबकि, इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल सार्वजनिक कल्याण और अच्छे कार्यो के प्रचार के लिए तथा पराजय में भी विनम्र बने रहने के लिए किया है।

सार्थक नागरिक भागीदारी के लिए यही जरूरी है। यही एक बड़ा कारण है कि मुझे भारतीय लोकतंत्र से बड़ी आशाएं हैं। इसके अलावा और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कारण यह है कि भारत के लोगों में इस 21वीं सदी में इस कसौटी पर खरा उतरने की क्षमता है।

(भारतीय मूल के अमेरिकी उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक फ्रैंक इस्लाम वाशिंगटन में रहते हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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